ज़िंदगी झेलने के लिए नहीं, खेलने के लिए है आचार्य प्रशांत (2024)

उसपे दिल जान सब न्योछावर कर दो जो टिक सकता है य सहम सिकुड़ना सिसकना ऐसे क्यों जीना ऐसा रखिए अपने आप को कि आज ही आपका सब कुछ छिन भी जाए तो भी आप पर एक सीमा से आगे प्रभाव ना आए मिल रहा है गुलाब जामुन खाए जाओ कौन रोक रहा है पर लत नहीं लगनी चाहिए जो मेरा है वह छिन नहीं सकता जो मेरा नहीं है वह कभी मेरा था ही नहीं दोनों ही स्थितियों में मैं र क्यों दूसरों के दिए पर नहीं चलना ना दूसरों के दान पर ना दूसरों के उधार पर हमारी जिंदगी में हमारी हस्ती की खनक होनी चाहिए अपने बाप का खा रहा हूं किसी और के बाप का नहीं मेरा एक ही बाप है कौन या तो ऊपर उंगली दिखाकर उसको इंगित करते हैं या इधर अच्छा सवाल है करना चाहिए जैसे फिल्मों में होता है तुझे पता है मेरा बाप कौन है चप जीए आचार जीवन में कुछ भी समान नहीं है जिसको उठने मिला है वो गिरेगा भी पर मैं जब खुद को देखती हूं तो मन उठने के समय में बहुत खुशी और घमंड से भर जाता है साथ ही डर भी रहता है कि गिर ना जाऊ क्योंकि उसके पीछे अशन होता है कि अगर गिर गई तो अंदर भी कुछ ऐसा है जो टूट जाएगा तो इसीलिए उसको सिक्योर करने की कोशिश हर समय बनी रहती है और यह चीज मैं अपने जीवन के छोटे-छोटे कार्यों में देखती हूं कि ये पैटर्न बहुत ज्यादा मैं फॉलो करती हूं कि सब कुछ कंट्रोल रखना चाहती हूं सब कुछ कैलकुलेटेड रहे पहले से ही तो कैसे इस उठने और गिरने के चक्र से बाहर डर सुरक्षा मांगता है नियंत्रण मांगता है देखे नहीं है कंट्रोल फ्रीक्स वह अप्रत्याशित कहीं कुछ अनुमानित ना हो जाए कहीं कुछ अगणित ना हो जाए अन कैलकुलेटेड अनप्रिडिक्टेड और जीवन में आप कितनी भी आशा कर लो और गणित लगा लो जो होगा वह तो अलग ही होगा महात्मा बुद्ध के पिता ने कितनी तो कोशिश कर थी सचमुच उन्होंने बाप रे बाप कर दिया कि यह लड़का किसी भी तरह हाथ से निकलना नहीं चाहिए कहते बचपन से ही लक्षण दिखाने लग गए थे पूत के पांव पालने में तो आसपास के लोगों ने कहा कि अगर इसको आप बचा ले गए तो यह आज तक का सर्वश्रेष्ठ राजा निकलेगा अद्भुत यह क्षमताएं दिखा रहा है ज्ञान दिखा रहा गुण दिखा रहा है तो उसको बचा ले जाओ चक्रवर्ती निकलेगा बहुत कथाएं कहते हैं कि पहाड़ों से उतर कर के कोई पंडित आया था उसने देखा और कहा कि जैसा भी और अगर इसको नहीं बचाया तो यह वैरागी हो जाएगा इतनी कोशिश करी उनके पिता ने जितना उनको भोग राग दे सकते थे सब दिया दुखों से बचाया जीवन के तथ्यों से दूर रखा तो क्या होता है कुछ नहीं एक पल में हमारे द्वारा निर्मित सारा महल रेत की भीत की तरह फट से गिरता है एक झोका चाहिए हवा का कि जैसे कोई कितनी खुशी से अपनी सफलता का उत्सव मना रहा हो सक्सेस की लेट नाइट पार्टी और यह सब करके सड़क पार कर रहा था और गाड़ी ले गई कितने पल लगे सब बदलने में कितने पल लगे तो बदल तो जाना ही है ना जो बदल जाना ही है उसको क्यों रोकने की कोशिश करनी जान लो कि यह नहीं टिक सकता और जो टिक सकता है उसको जान दे दो उस परे दिल जान सब न्योछावर कर दो जो टिक सकता है वह प्रक्रिया नीति नीति की है उसको कैसे जान दी जाती है उन सब से अपनी जान वापस खींच कर जो टिकें नहीं पर जान बने बैठे हैं प्रक्रिया नीति नीति की है अगर उसको जान बनाना है जो टिकेगा तो जो बाकी सब जान है इनको तो यही बोलो जा ना जाना को बोलो जाना व जरूरी नहीं है कि कोई व्यक्ति ही हो आपके इरादे आपकी आशाएं आपकी उपलब्धियां जो कुछ भी आपकी पहचान बना बैठा है उसको बोलो जा ना समझ में आ रही है बात यह सहमी हुई जिंदगी है और सहमी हुई जिंदगी सिकुड़ी होती है और सिसक रही होती है सहना सिकुड़ना सिसकना ऐसे क्यों जीना जब भीतर मिला ही हुआ है विवेक का कवच जो बचा कर रखेगा तो बाहर 100 तरह के कवच क्यों पहनने जो लोग बहुत गर्म इनर पहन लेते हैं थर्मल जाड़ों का उदाहरण दे रहा हूं उन्हें बाहर भी क्या मोटा कोट ला देना पड़ता है लाना पड़ता है क्या और आते हैं ऐसे वाले साइबेरिया की दुकानों में मिलते हैं वहां से लेकर आओ वो एक अंदर पहन लीजिए शर्ट के तो शर्ट के ऊपर कुछ नहीं पहनना पड़ता फिर तो वो तो फिर भी बाहरी बात है कि शरीर के ऊपर पहन रहे हो एक एक इनर ऐसा होता है जो सचमुच इनर होता है उसके बाद बाहर के किसी रक्षा कवच की जरूरत नहीं पड़ती है उसके बाद खुलकर जियो खुलकर खिलो खुलकर खेलो बेधड़क होक के हमारा कुछ नहीं छिन सकता हमारा कुछ नहीं बिगड़ सकता अब काहे के लिए नियंत्रण चाहिए कंट्रोल चाहिए यह जो सारी चिंता और परेशानी रहती है ना यह स्वार्थ वश रहती है य स्वार्थ है जो इतना चिंतित रखता है क्योंकि स्वार्थ भी कहीं ना कहीं जानता है कि पूरा तो होने से रहा स्वार्थ में स्व ही क्या है अधूरा तो स्वार्थ पूरा कहां से होगा कभी स्वार्थ नहीं पूरा होता कितना भी अपना आप स्वार्थ लहा लीजिए स्व तो अधूरा ही रह जाता है ना कभी हुआ कि कोई स्वार्थ पूरा हुआ उससे आप भी पूरे हो गए कभी हुआ तो तमाम तरह के स्वार्थों के पूरे होने के बाद भी स्व तो अधूरा ही रह जाता है तो डरा रहता है वो ऐसे क्लच करता है उसकी मुट्ठी हमेशा ऐसे बंद रहती है उसके जबड़े बिचे रहते हैं उसके शरीर में तनाव रहता है पकड़ना चाहता है और कितना भी पकड़ लो पकड़ी हुई चीज रेत की तरह उंगलियों के बीच से फिसली जाती है फिर भी सीखता नहीं कहता और फिर रेत उठाता और मुट्ठी जितनी जोर से दबाओगे रेत की जगह पानी का उदाहरण ले लो पानी मुट्ठी में पकड़ चाहता जितनी जोर से मुट्ठी बचोगे पानी उतनी तेजी से निकलेगा सागर के प्रति प्रेम चाहिए बाकी जितना कुछ है उसके प्रति अनासक्ति और अनासक्ति का मतलब दुराव नहीं होता नहीं होता अनासक्ति का यही अर्थ है कि तुमसे स्वार्थ का रिश्ता नहीं जोड़ेंगे रिश्ता जोड़ लेंगे अनासक्ति का मतलब यह भी नहीं है कि तुमसे कोई रिश्ता नहीं रखेंगे तुमसे स्वार्थ का रिश्ता नहीं रखेंगे स्वार्थ हम जानते ही नहीं प्रेम हम जानते हैं और प्रेम जिस एक से करा जाता है उससे है बाकियों से कुछ नहीं बाकियों से कुछ नहीं माने बाकियों से स्वार्थ नहीं लोग डर जाते हैं अनासक्ति मतलब समझते हैं कि वह सब छोड़ छाड़ के भग जाएगा कहीं पर काहे को भग जाएगा यह सब जिंदगी को दीमक की तरह चाट जाएंगे चिंताएं असुरक्षा डर कहीं कुछ अनपेक्षित ना हो जाए जीने नहीं देंगी चीजें आपको क्योंकि आप कितना भी रोको जो अनपेक्षित है वह तो होगा आपके हिसाब से तो नहीं चलने वाला जीवन तो आप जीवन को कहो तू जब मेरे हिसाब से नहीं चलता तो मैं तेरी बाट क्यों जो हूं जिसको अपने हिसाब से चलना है मैं उसका मुंह क्यों तकं फिर तू अपना काम कर तू प्रकृति है तू अपने हिसाब से बह हमको जिसका होना है हम उसके हो जाते हैं हम पैदा हुए हैं सत्य के लिए हम पैदा हुए हैं जानने के लिए सीखने के लिए मुक्ति के लिए हम अपना काम करेंगे ऐसा रखिए अपने आप को कि आज ही आपका सब कुछ छिन भी जाए तो भी आप पर एक सीमा से आगे प्रभाव ना आए यह नहीं होना चाहिए कि आपकी चीजें छिन गई या रिश्तों में कुछ हो गया या इज्जत लोगों ने देनी बंद कर दी तो आपको लगे कि आपका अस्तित्व ही मिट गया यह नहीं होना चाहिए दुनिया जो चीजें दे रही है बढ़िया अच्छी बात मिल रहा है गुलाब जामुन खाए जाओ कौन रोक रहा है पर लत नहीं लगनी चाहिए आज चरण स्पर्श बोल रही है कल चरण प्रहार भी कर सकती हैं ना हमें चरण स्पर्श में कोई बहुत मजा आ गया ना चरण प्रहार से हम बड़े चिंतित हो जाने वाले करिए जो करना है समझ में आ रही है बात ये अपने आप से पूछा करिए सब कुछ चला भी जाए सब कुछ तो भी हम है ना ठीक है देखो सब कुछ चला जाए बुरा तो लगता ही है कौन कह रहा नहीं लगता हां सुविधा भी टूटती है भावों में भी दरार आती है यह सब होता है ठीक लेकिन इस सबके बाद इतना रहे कि हम मिट ही नहीं जाएंगे जो आपकी बॉटम लाइन है जो आपका वर्स्ट केस सिनेरियो है वह भी टॉलरेबल होना चाहिए उसके बाद आप खुल के खेल सकते हो आप कहते हो जो बुरे से बुरा हो सकता है वह भी सहनी है जो बुरे से बुरा है जो वर्स्ट केस है अगर वो भी सहा जा सकता है तो फिर जिंदगी स्वतंत्र हो जाती है आफत उनकी रहती है जिनके वर्स्ट के सिनेरियो में एक्सटिंक्शन लिखा होता है मैं ही नहीं रहूंगा वह परेशान हो जाते हैं उनको फिर रात में नींद नहीं आएगी उनको फिर न्यूरोसिस है और इनसोम्निया और नींद की गोलियां और यह सब चलता उनका दुनिया की चीजों को सर मत चढ़ने दो ना मान को ना अपमान को ना सुख को ना दुख को दावत है दावत में कभी जाओ तो बहुत स्वादिष्ट कुछ मिल जाता है कई बार जाओ तो पता चलता है कुछ भी नहीं है ठीक दावत में क्या मिलेगा आपका उस परे होता है कुछ अधिकार कुछ नहीं होता कुछ बहुत अच्छा मिल गया तो हम कहां कह रहे चूको अच्छे से झाड़ दो सब कुछ एक बार नहीं दो बार प्लेट भर भर के झाड़ो कौन रोक रहा है लेकिन कुछ नहीं मिले तो मन खट्टा मत करो जी छोटा मत करो नहीं मिला तो नहीं मिला अब मिल गया तो अब ना चूक चौहान आ रही बात समझ में जैसे कहते हैं लोक भाषा में क्या उखाड़ लोगे बस यही अपने मन से पूछा करिए क्या क्या 80 90 प्र तो जो हमारे डर होते हैं और सुरक्षा की जो हमारी हवस होती है व निर्मूल है वो डर भी काल्पनिक है उनका यथार्थ से कोई लेने देना नहीं तो वो तो वैसे ही हटा दीजिए और जो 10 20 प्रतित बचेंगे डर डर का मतलब होता है भविष्य की कोई कल्पना कि ऐसा कुछ हो जाएगा बुरा यही डर होता है जो 10 20 प्रतिशत बचेंगे भी उसमें अपने आप से पूछिए चलो अगर हो भी गया तो क्या बुरा लगेगा मैं आपको सुपरमैन बनने को नहीं बोल रहा हूं या सुपरवुमन की आप कह कि नहीं मैं तो मुझे मालूम है कुछ भी हो जाए मेरा कुछ नहीं बिगड़ता बिगड़ता है हम भी जानते हैं बिगड़ता है हमारा भी बिगड़ता है पर बिगड़ने की एक सीमा होनी चाहिए हा बिगड़ेगा पर इतना ही बिगड़ेगा उसके नीचे क्या है उसके नीचे हमारा आधार है उसके नीचे आत्मा है वहां कुछ नहीं बिगड़ता सब छीन सकते हो हमारा आत्मा थोड़ी छीन लोगे वो नहीं बिगड़ता मेरे सब कुछ छीन के कर दो सड़क पर खड़ा मैं जो हूं वह थोड़ी छीन पाओगे और जो कुछ तुमने छीना वह मेरे मैं होने की वजह से था मेरे पास ठीक ठीक तो जो असली चीज थी वो तो अभी भी है मेरे पास और जो कुछ तुमने छीना अगर वो बस संयोग से था मेरे पास तो फिर मैं रो क्यों रहा हूं अगर छिन गया वह तो था ही संयोग से मेरा नहीं था उधार का था चोरी का था संयोग का था मेरा नहीं था तो अगर छिन गया तो मैं रोऊ क्यों और अगर जो छिना है वह मैं की छाया है मैं का उत्पाद है मैं का परिणाम है तो जो मूल चीज थी वो तो अभी भी मेरे पास है मैं तो मैं रोऊ क्यों किसी भी हालत में मैं रोऊ क्यों अवधूत गीता में एक के बाद एक श्लोक आते हैं हां और सब अंत वस एक सवाल पूछते हैं तू रो क्यों रहा है सबके जो य आप लोग आज डालिए आपका आज का काम एक के बाद एक श्लोक है जो यही पूछ र तू रो क्यों रहा है तू रो क्यों रहा है तू रो क्यों रहा है जो मेरा है वह छिन नहीं सकता जो मेरा नहीं है वह कभी मेरा था ही नहीं दोनों ही स्थितियों में मैं रो क्यों चोरी का माल रखना बंद करि रातों को नींद अच्छी आएगी चोर बेचारा कैसे चैन की नींद सोएगा उसने कहीं कुछ चोरी की हो उसकी तो नींद चोरी हुई है चोरी का माल रखना बंद करो और उधारी सब पटा दो उधार का माल रखोगे हमेशा खटका लगा रहेगा कि लेनदार कभी भी आ सकता है रहेगा ना तो उधार के माल को मैं कहना बंद करो मेरा कहना बंद करो वो तुम्हारा नहीं है और जानते हो तुम्हारा नहीं है यह देह भी उधार की है कि नहीं है भैसे वाले भैया कभी भी आ सकते हैं देह उनकी है देह से इतना जुड़कर जिंगी तो नींद नहीं आएगी जो चीज दूसरों की है उसको अपना कहना बंद करो जो चीज संयोग की है उसको अपना कहना बंद करो संयोग ने दी थी संयोग ही लेकर जाएगा हाय टूट गई मोरी जोड़ी टूट गई तोर जोड़ी अरे जिन जोड़ी तिन तोड़ी तेरी कौन सी जोड़ी थी रे जैसे जुड़ी थी वैसे ही टूट गई संयोग से व मिला था संयोग से बह गया अब काहे के लिए मुझे मालूम है आपद क्षण में भावना इतनी जोर की उठती है कि ज्ञान पीछे हो जाता है लेकिन फिर भी इतना तो रखिए ना कि मन एकदम ही विक्षिप्त ना हो जाए सर पर उधार चढ़ा हो नींद आएगी कहीं से चोरी करके लाए हो और माल दबाए हो पलंग के नीचे नींद आएगी इसलिए हमें नींद नहीं आती और इसलिए हम को खटका लगा रहता है और बार-बार देखते हैं कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं हो गई नियंत्रण हमें इसीलिए चाहिए सुरक्षा की मांग उसको ही होती है जो पराई चीजें पकड़ के बैठा होता है जिनको चिंता बहुत सताती हो वह अपने जीवन में झांक और देखेंगे चोरी कहां है उधारी कहां है चोरी का माल पकड़े रहने में आपको जो फायदा होता होगा स होता होगा कीमत बहुत बड़ी देते हो आप ठीक से हिसाब लगाओ गणित साफ रखो तो पाओगे कि यह चोरी उधारी पटा देने में ही मुनाफा है जिससे चुराया उसको दे दो और अगर नहीं दे सकते तो अपने घर के किसी कोने में छोड़ दो कि पड़ा रहे यहां पर मेरा नहीं है और उधारी तो जिससे ली है वहां तो जाकर पक्का उर्ण हो जाओ यह आपका उधार यह लीजिए और ब्याज समेत वापस लीजिए हमें नहीं रखना जो मुक्त है सिर्फ वही मौज में है बीमानी है ना छल है कपट है जो चीज अपनी नहीं उसको कह रहे मेरी है उस कपट की कीमत क्या होगी तनाव चिंता एक आदमी है बिल्कुल निखट्टू कुछ उसमें कर पाने की कोई क्षमता नहीं क्योंकि उसने क्षमता कभी विकसित करी नहीं श्रम करना चाहता नहीं न निखट्टू पूरा है भीतर लालच भी बराबर का है पूरा इसको कहीं पर मिल गया हजार का नोट इसके लिए तो ऐसा हुआ जैसे बिल्ली के भाग से छी का फूटा एक दूसरा आदमी है पुरुषार्थी है श्रम करता है उस दूसरे आदमी के लिए हजार के नोट का क्या वही अर्थ है जो इस निखट्टू के लिए मेरे होने से यह हजार का नोट है हजार चला भी गया तो मैं हूं ना मैं हूं दूसरी और इस दूसरे को जो निखट्टू को मिला व बस संयोग से मिला है कोई आधारभूत कारण नहीं है प्राप्ति का मात्र संयोग है इसका अगर हजार छिनेगा तो दोबारा नहीं मिलेगा क्योंकि मिलना संयोग तोय बहुत डरा हुआ रहेगा कि हजार मिल गया कहीं छिन ना जाए इसकी उड़ गई रातों की नींद लेकिन जो अपने श्रम से कमाता है उसके लिए तो यह हजार का नोट क्या है कुछ नहीं मैं तो काम करता हूं उसी का बाय प्रोडक्ट है सह उत्पाद है पैसा आ गया था मैं जो हूं मेरा काम जैसा है मुझे उससे मतलब है और मेरा काम मेरे होने पर आश्रित है मैं रहूंगा काम होता रहेगा पैसा आता रहेगा हजार आज है नहीं है क्या करना है मुझे कोई पैसे के लिए मैं थोड़ी काम कर रहा हूं मेरा कर्म तो मेरे अस्तित्व की प्रतिध्वनि है मैं हूं तो मेरा कर्म है उस कर्म से एक बाय प्रोडक्ट की एक सह उत्पाद की तरह पैसा आ गया था अभी हजार रुपया है तो है नहीं है तो नहीं है हम इसके लिए थोड़ी मर रहे हैं निखट्टू के लिए हज रुप सचमुच मर जाएगा हज रुप के लिए क्योंकि स मिला था संयोग से मिला था और लालच बहुत है आसक्ति बहुत है दूसरी और य पुरुषार्थी है इसको प्रेम किससे है अपने कर्म से उस कर्म के परिणाम से नहीं तो कह रहा मुझे तो मेरे काम से मतलब है काम मैं कर रहा हूं उस काम से हजार रुप आ गया था उस काम से हो सकता है हजार रुप ज्यादा भी आ जाए कल उस काम से हो सकता है कुछ भी ना आए कुछ भी नहीं आएगा तो भी मैं अपना काम थोड़ी छोड़ दूंगा अगर हम किसी चीज को खोने को लेकर के बहुत आशंकित हैं तो बहुत संभावना यह है कि हम उस चीज के लायक भी नहीं है वह चीज इतनी बड़ी हो गई है हमारे लिए कि हमारी हस्ती उस चीज पर आश्रित हो गई है और जो चीज आपके लिए इतनी बड़ी हो गई है निश्चित रूप से वह चीज आप की कमाई हुई तो नहीं है य तो आपका तुक्का लग गया है दूसरों के दिए पर नहीं चलना ना दूसरों के दान पर ना दूसरों के उधार पर हमारी जिंदगी में हमारी हस्ती की खनक होनी चाहिए अपने बाप का खा रहा हूं किसी और के बाप का नहीं और मेरा एक ही बाप है कौन या तो ऊपर उंगली दिखा के उसको इंगित करते हैं या इधर हम मुझे इधर कहना पसंद है इसके होने से हमारा वजूद है दुनिया के होने से हमारा वजूद नहीं है तो क्यों डरे कहते हैं ना हम जन भाषा में किसी के बाप की खाते हैं हमें जो मिला है हमारे बाप से मिला है मां बोल लीजिए जो बोल सत्य आत्मा कैसे बोलना यह पाप है पराए माल को अपना कहना यही पर धर्म है जो कहते हैं ना पराई नार पराए धन पर नजर मट डा लो उसको और विस्तार दीजिए जो कुछ भी पराया है उस पर नजर मत डालो मात्र पराई नारी या पराई धन ही क्यों सब कुछ ही पराया है जिसको तुम अपनी नारी कहते हो व भी तो पराई ही है एक दिन ऐसा आएगा कोई काह काना घर की नारी का कहे तन की नारी नाई घर की नारी का क्या भरोसा है जो तन की नारी है यह भी जाएगी नारी माने य ना नारी सब पराए हैं घर की नारी भी पराई है और यह तन की नारी यह भी पराई है तो क्या हम किसी का भरोसा किसी के किसी पर नहीं जीते हम अपने में जीते यही अध्यात्म पर पराए माल को गप करने में उस वक्त बड़ा मजा आता है आता है कि नहीं आता है और फिर उसकी जो कीमत मत देते हो तो फिर खून के आंसू रोते हो लगातार याद रखो यहां ना कुछ अपना है ना कुछ अपना करने की जरूरत है क्योंकि अपने बाप की तरफ से हम पहले ही पूरे हैं हम पूरे होकर आए हैं ठीक है इस जगत में वस्तुओं का पूरा मेला है भंडार है गोदाम है लेकिन हम करें क्या हम तो पहले ही पूरे हैं तुम हमें क्या दिखा दिखा के रिझा लोगे दो कौड़ी की चीजें तुम्हारी यह हमारे खेलने के लिए अच्छी है हमारे जुड़ने के लिए अच्छी नहीं है क्योंकि हम तो पहले ही पूरे हैं कोई रिझा ए कोई लुभाए कोई डराए मुस्कुराओ जो रिझा रहा है वो कह रहा है तुम में कुछ जोड़ दूंगा जो डरा रहा है वो कह रहा है तुमसे कुछ तोड़ लूंगा दोनों मूर्ख है दोनों को पता ही नहीं कि हमारा बाप कौन हैय अच्छा सवाल है करना चाहिए जैसे फिल्मों में होता है तुझे पता है मेरा बाप कौन है े पता है मेरा बाप कौन और थोड़ा नारीवादी हं तो तुझे पता है मेरी मां कौन है कैसे ही बोलिए पर ये अच्छा है दुनिया बाजार है यह लुभाता भी है और डराता भी है लुभाने आए कि डराने बस यह बोलो ना तुम हम में कुछ जोड़ सकते ना तुम हम में कुछ तोड़ सकते हम पूरे हैं पूरे एकदम पूरे बाकी खेलने कूदने के लिए तुम अच्छे हो आओ तुम्हारे साथ खेल कूद लेंगे उतना ठीक मस्ती के लिए ही तो है जिंदगी अगर आप भीतर से पूरे हो तो बाहर बस मस्ती ही मस्ती है मौज करो पर किसी के साथ खेलना एक बात होती है और उससे डर जाना बिल्कुल दूसरी बात होती है डर जाओ तो क्या खेलोगे कुछ नहीं हम जगत के साथ खेल भी इसीलिए नहीं पाते क्योंकि हम जगत से डरे हुए रहते हैं या जगत के प्रलोभन में लालच में रहते हैं तो भी नहीं खेल सकते मैं आपको एक गेंद दे रहा हूं लीजिए खेलिए आप खेलेंगी ना गेंद दूंगा तो खेलेंगी ना मैं आपको गेंद दे रहा हूं गेंद है य ली खेलिए खेलेंगी ना यह 15 करोड़ की गेंद है अब खेलिए अब क्या करेंगी उनकी आवाज क्यों बंद कर दिए मेरी जान हम ये संभाल के खेलूंगी संभाल के खेलेंगे अच्छा ये 150 करोड़ की गेंद है खेलिए नहीं खेलूंगी हम जगत के साथ खेल भी इसीलिए नहीं पाते क्योंकि इतनी कीमत दे देते हैं उसको 150 करोड़ का है जो 150 करोड़ का होग उस साथ आप खेल नहीं सकते अब भले ही वो गेंद हो पर नहीं खेल पाओगे अब हम अब ठीक है ये ये गेंद दे रहा हूं खेलिए खेल रही है अरे गेंद नहीं था ये ग्रेनेड था हथगोला था जो उछाला था खेलोगे फिर से नहीं खेलोगे क्योंकि डर गए डर जाओगे तो भी नहीं खेल सकते जहां डर है वहां भी खेल नहीं है और पैदा हुए हो खेलने के लिए लेकिन खेल वही सकता है जो मुक्त हो जो मुक्त नहीं है वोह या तो डरेगा या भागेगा या बांधे यही सब करेगा वो समझ में आ रही है बात ये किस लिए पैदा हुए हो खेलने के लिए पर खेलना मुफ्त नहीं मिलता खेलने के लिए अहम की कीमत चुकानी पड़ती है खेलना आपका अधिकार है जिसे अर्जित करना पड़ता है मुफ्त का अधिकार नहीं है वह वह अधिकार कमाना पड़ता है कैसे कमाया जाता है वह अपना दाम चुका के जो अपने स्वार्थों का दाम चुका देगा वह खेलने की पात्रता पा लेगा फिर उसको मौज आ जाती है उसका तनाव हट जाता है उसको नींद बढ़िया आती है वह डरता वगैरह नहीं है वह विपत्ति की स्थिति में भी चुटकुले मार देगा वह परेशान भी हो जाएगा तो उसकी परेशानी एक सीमा से आगे नहीं जाएगी तो आज आप पता करोगे कि पराया माल कहां-कहां गप कर रखा है आपने पुलिस आए डंडा बजा के आपसे चोरी का माल छीन ले जाए इससे पहले उसको खुद ही वापस कर दो यह भी दिखता है आचार्य जी कि जितनी भी चीजें खुद के साथ जोड़ी हुई है यह बाहर से ही आ रही है और यह बाहर वालों को ही किसी तरीके से अपना काम निकलवाने के लिए या स्वार्थ वर्ष या इंप्रेस करने के लिए या फिर वो बाहर सब कुछ बाहर बाहर ही हो रहा है और पर धर्म पर ही चल रहे हैं दिखता है ये एकदम साधारण सा नियम है ना दूसरे की चीज है तो दूसरे की ही ना उसके भरोसे कैसे जी लोगे दूसरों की दी हुई इज्जत दूसरों का दिया हुआ पैसा दूसरों के दिए हुए आश्वासन इन पर भरोसा करना बंद करो मान के चलो कि कुछ नहीं है किसी ने कोई वादा किया है वह कभी भी टूट सकता है कोई इज्जत दे रहा है वह कभी भी बेइज्जत भी कर सकता है कुछ नहीं है और है तो है जब तक पड़ा है जीवन में तो ऐसे पड़ा है जैसे किसी दूसरे का माल कई बार हमारे घर में पड़ा होता है होता है ना कोई दूसरा कहीं जा रहा है तो कुछ दिनों के लिए आपको कुछ दे गया तो आप उसको अपना थोड़ी मान लेते हो आप उसका भोग थोड़ी शुरू कर देते हो कोई कुछ दे गया आप उसको रख लेते हो आपको पता है मेरे घर में रखा है पर किसी और का आएगा तो लौटा दूंगा नहीं भी आएगा तो उसको नहीं लौटा हंगा तो किसी और को लौटा हंगा पर अपना थोड़ी मानने लगूंगा इसको दूसरों की दी हुई सब चीजों को याद रखो कि पराई है उनका भरोसा नहीं करते उनसे इतनी आत्मीयता इतना तादाद में ठीक नहीं और दूसरों की चीज से खेल भी नहीं पाओगे अच्छा यह गेंद दे रहा हूं भाग रही है मैं गेंद दे रहा हूं आपको दो गेंदे दी थी देखिए अब तीसरी दे रहा हूं यह गेंद लीजिए खेलिए खेलिए इससे यह साधारण है यय 1 स करोड़ वाली नहीं है यह सस्ती गेंद है 50 की खेलिए पर ये मेरी है आपको दे रहा हूं खेलिए खेल पाएंगी क्यों क्योंकि दूसरे की है इसीलिए डर रहेगा कि बहुत संभाल के खेलनी पड़ेगी तो दूसरे की चीज महंगी हो तो भी नहीं खेल सकते दूसरे की चीज डरावनी हो तो भी नहीं खेल सकते दूसरे की चीज कुछ भी ना हो सिर्फ दूसरे की हो तो भी नहीं खेल सकते क्योंकि दूसरे की है मैं अपनी गाड़ी आपके घर खड़ी कर जाऊ कुछ दिनों को जा रहा हूं आपके यहां रख रहा हूं आप उसको लेकर निकल जाओगे क्या हज किलोमीटर कभी किसी वजह से आपको चलानी भी पड़ी तो आप बहुत संभल के चलाओगे कि इसमें खरच ना आ जाए कुछ हो ना जाए इसको वापस लाके रख दो भाई खेल नहीं पाओगे [संगीत] ना चलिए अब अपनी गेंद का प्रबंध करिए तीन जब हट जाते हैं तो जो बचता है उसे अपना कहते हैं अपना माने आत्मा चतुर्थ तुरीय जाइए अब चौथे को खोजिए जाति हमारी [संगीत] आत्मा गोत्र हमारा ब्रह्म जाती हमारी आत्मा गोत्र हमारा [संगीत] ब्रह्म सत्य हमारा बाप है मुक्ति हमारा धर्म रे साधो मुक्ति हमारा एक दिन ऐसा [संगीत] होएगा कोई काह का [संगीत] नाही एक दिन ऐसा [संगीत] होएगा कोई काह का ना घर किनारी को कहे तन किनारी जाहि रे साधो तन किनारी जाही चाह गई चिंता मिटी मनवा [संगीत] बेपरवाह चाह गई चिंता मिटी मनवा बेपरवाह जिनको कुछ नहीं चाहिए वो शाहन के शाह रे साधो वो शाहन के शाह बैद मुआ रोगी [संगीत] मुआ मुआ सकल [संगीत] संसार बैद मुआ रोगी मुआ मुआ सकल [संगीत] संसार एक कबीरा नाम हुआ जाके राम आधार साधो जाके राम आधार नमस्ते सर मेरा नाम मुस्कान है मैं दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा हूं जन्म कर्मा चम दिव्यम एवं योति तत्ता त्वा देहम पुनर्जन्मा मैती मामे स्व जना तो आज हमने सीखा कि महानता कहीं बाहर से नहीं आती है वो हमारे अंदर पहले से ही होती है और हम सोचते हैं कि कोई आएगा वो समाज को सुधारे या चीजें ठीक करेगा वह ताकत हमारे अंदर ही है और हमें ही उसको जगाना है और महान होने का अर्थ यही है महान होने का अर्थ ही यही है कि वह महानता को सब में जगाना चाहता है और हमें किसी के भरोसे नहीं बैठना है खुद ही जिम्मेदारी लेनी है चीजों की और किसी से भी आस नहीं रखनी है इस बात [संगीत] की ब

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