पढ़ी लिखी बेरोज़गारी, और सरकारी नौकरी की तैयारी आचार्य प्रशांत (2024)

[संगीत] पर खास तौर पर जो स्टेट लेवल इसमें एंट्रेंस होते हैं उनमें कई बार तीन-तीन साल लग रहे होते हैं कई बार तो कोर्ट में जाकर के कहना पड़ता है कि कब हुआ था एग्जाम अभी तक उसका आपने रिजल्ट क्यों नहीं डिक्लेयर करा है बहुत मुश्किल नहीं है सच पूछो तो यह जितने भी एग्जाम्स हैं इन्हें निकालना बहुत मुश्किल नहीं है कारण बता देता हूं अगर 1000 सीट है किसी एग्जाम में तो उसके लिए सचमुच तैयारी करने वाले पाच या 7000 होते हैं बस बाकी बस अपना वक्त खराब कर होते तो बहुत कंपटीशन है नहीं नमस्कार आचार्य जी मतलब मैं कई महीनों से मेरी इच्छा थी कि मैं एक ऑफलाइन सेशन करूं और आज मैं बैठी हूं भारत में द प्रोपोर्शन ऑफ अनप्लड यूथ बिलो द एज ऑफ 30 इयर्स मतलब 54 पर इन 2009 से सर्च किया है पूरा 65 पर इन 2022 तो अब पता चला था कि हाईली एजुकेटेड लोग इसी चक्कर में फस जाते थे कि जितनी बड़ी डिग्री उतनी जितनी बड़ी डिग्री उतनी बड़ी नौकरी तो और दूसरी तरफ अमंग द इलिटरेट पीपल पता चला कि अन अनमल मेंट रेट्स मैक्सिमम 3.5 पर तक ही जाते हैं तो रीजन हमें पता है बट इसका सलूशन क्या है इसका सलूशन यह है कि एंप्लॉयड लोगों को जो झुनझुन हम देकर रखते हैं ना वोह हटाने पड़ेंगे भारत में जो सबसे बड़ा झुनझुना होता है व सरकारी नौकरी का होता है और जो हमारी सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्था है वह उस झुनझुन के समर्थन के लिए बनी है झुनझुना बजेगा बच्चा नाचेगा और समाज और परिवार ताली बजाएगा दुनिया के किसी देश में ऐसा नहीं होगा कि आप 3032 साल के हो गए हो और आप बेरोजगार हो और आप शान से बोलो कि अभी तो हम कंपटीशन की तैयारी कर रहे हैं बिल्कुल चौड़े होकर बोलो कि अभी तो हम तैयारी कर रहे हैं भारत में यह बहुत बड़ा झुनझुना है तो बस यही बात है और कुछ भी नहीं है देखो आपने कहा कि जो जो कम पढ़े लिखे लोग हैं उनमें बेरोजगारी की दर भी कम है कारण सीधा है उनके पास झुनझुना नहीं है ना उनमें से कोई बिल्कुल बेपर है कोई चौथी पास है कोई आठवी उसको पता है कि बाहर निकल के कोई बड़ी नौकरी तो वैसे भी नहीं मिलनी है तो क्या करते हैं उनको जो काम मिलता है व करना शुरू कर देते हैं और कच्ची उम्र से शुरू कर देते हैं कोई 16 से शुरू कर देता है कोई 18 से कोई 20 21 से इसके आगे कोई बेरोजगार बैठता ही नहीं क्या करेगा बेरोजगार बैठ के तो शुरू कर देता है और आप जानते हो बहुत मजेदार बात य आप लोग निकाल कि कहां का सर्वे है 35 की उम्र में जितना इनकम डिफरेंस होना चाहिए एक हाईली एजुकेटेड और एक सेमी एजुकेटेड में अनएजुकेटेड की मैं बात नहीं कर रहा आपने अन एजुकेटेड ही करी थी मैं सेमी एजुकेटेड ले रहा हूं जितना डिफरेंस होना चाहिए हाईली एजुकेटेड से यहां पर आशय है जो ग्रेजुएशन कर चुके हैं और सेमी एजुकेटेड माने शायद उस स्टडी में था कि छठी या आठवी जो मिडिल जो पास कर च वो डिफरेंस इंडिया में मिनिमम है बड़े देशों में इसका मतलब समझना अभी हम क्या सोचेंगे किसी ने बैचलर्स कर रखा है फिर पीजी कर रखा है ठीक है पोस्ट ग्रेजुएट है और कोई सिर्फ छठी पास है हम क्या सोचेंगे कि 35 की उम्र में उनकी आमदनी में कितना अंतर होगा बहुत सारा अंतर होगा और दुनिया के बाकी देशों में होता भी है वहां पर शिक्षा के हिसाब से आय में काफी बड़ा अंतर दिखाई भी देता है लेकिन भारत में जब एग्रीगेट लेवल पर लिया जाता है कि यह साहब यह हमने एक एक 10 लाख लोगों का सैंपल ले लिया उनमें से कोई छठी पास था कोई आठवी पास था और यह हमने एक 10 लाख लोगों का और सैंपल ले लिया ठीक है उसमें कोई बीएससी वाला है कोई एमटेक वाला है कोई पीएचडी वाला भी है उसको भी ले लिया और 35 की उम्र में इन दोनों सैंपल्स की एवरेज इनकम कंपेयर करी गई तो उसमें डिफरेंस आता है व वर्ल्ड में मिनिमम है इसका मतलब समझ रहे हो क्या है इसका मतलब क्या है इसका मतलब यह है कि भारत में जो जो कम पढ़ा लिखा है वह चूंकि पहले से ही काम करना शुरू कर देता है तो 35 की उम्र तक एक अच्छी जगह पर पहुंच जाता है स्किल्ड हो जाता है धीरे-धीरे अपने काम में बढ़ जाता है व कहीं पहुंच जाता है और यह जितने सरकारी नौकरी वाले हैं यह सब 3035 साल तक झुनझुना बजाते हैं यह उससे भी पीछे हो जाते हैं जो छठी पास है उससे भी पीछे हो जाते हैं या बस उसके समकक्ष हो जाते हैं और इस पूरी प्रक्रिया में सहारा बनते हैं मां-बाप और इस प्रक्रिया में सहारा बनते हैं पूरे पूरे जो सामाजिक तत्व होते हैं सरकार भी सहारा बनती है नहीं तो सरकार इतने सारे अटेम्प्ट्स क्यों अलाउ करेगी सब नौकरियों में और सरकार ऐसा क्यों करेगी कि यह जो एंट्रेंस एग्जाम होते हैं सरकारी इनमें कईयों में तो फॉर्म निकलने से लेकर के फाइनल रिजल्ट आने तक दो दो तीन-तीन साल लगा देते हैं एक एग्जाम ही तो है ना एग्जाम लेकर के दो या तीन महीने में समाप्त करो ना रिजल्ट दे दो पर खास तौर पर जो स्टेट लेवल इसमें एंट्रेंस होते हैं उनमें कई बार तीन-तीन साल लग रहे होते हैं कई बार तो कोर्ट में जाकर के कहना पड़ता है कि कब हुआ था एग्जाम अभी तक उसका आपने रिजल्ट क्यों नहीं डिक्लेयर करा है लेकिन रिजल्ट अगर डिक्लेयर नहीं हुआ है तो क्या बचा रह जाता है आशा का झुनझुना आशा का झुनझुना लटका हुआ है अब यह जो लड़का है जिसने एग्जाम दिया था यह बीच में जाकर के कहीं किसी दुकान में कोई साधारण काम करना थोड़ी शुरू करेगा यह बोलेगा साहब मैंने तो बैंक का एग्जाम दिया है या मैंने पीसीएस का एग्जाम दिया है मैं किसी जगह पर जाकर साधारण सेल्समैन थोड़ी बन जाऊंगा बीच में और जो बन गया था साधारण सेल्समैन वह धीरे-धीरे इन तीन सालों में व बढ़ता जा रहा है व बढ़ता जा रहा है व बढ़ता जा रहा है भारत का जो अनइंप्लॉयमेंट है ना वह बहुत अंडरस्टेटेड है बेटा भारत में हमें जो मिलता है अच्छे समझना व है अंडर एंप्लॉयमेंट हिडन अनइंप्लॉयमेंट वी आर ल अंडर र एंप्लॉयड भारत का जो अनइंप्लॉयमेंट है वह हिडन है समझ रहे हो जो आपके सामने आंकड़ा भी आता है ना कि इतने हैं व उससे ज्यादा है जो अनइंप्लॉयड है डिसगाइज है वह अपने आप को घोषित कर देता है कि साहब मैं भी कर रहा हूं पर व कर कुछ नहीं रहा है वो काम कर रहा है जो दिन के एक या दो घंटे में हो सकता है बाकी समय निकाल के कुछ और कर रहा है क्यों क्योंकि उसके भीतर यह मूल्य स्थापित ही नहीं किया गया है कि जवानी के साल 20 से लेकर 35 के साल जी तोड़ मेहनत करके जिंदगी संवारने के लिए हैं उसको य बताया ही नहीं गया उसको लाज ही नहीं आती कि मैं कुछ करता नहीं हूं वह आराम से पड़ा हुआ है और क्या बोल रहा है कि मैं तो अभी तैयारी कर रहा हूं बहुत मुश्किल नहीं है सच पूछो तो यह जितने भी एग्जाम्स हैं इन्हे निकालना बहुत मुश्किल नहीं है कारण बता देता हूं अगर 1000 सीट है किसी एग्जाम में तो उसके लिए सचमुच तैयारी करने वाले पाच या 7000 होते हैं बस बाकी बस अपना वक्त खराब कर रहे होते हैं तो बहुत कंपटीशन है नहीं बाकी सब बस हिडन अनइंप्लॉयमेंट वाले होते हैं जो कंपटीशन के नाम पर अपना समय खराब कर रहे हैं यह एक बहुत यूनिक फ ना है जो भारत में ही पाया जाता है दुनिया के किसी देश में सरकारी नौकरी को या ब्यूरोक्रेसी को इतनी तवज्जो नहीं दी जाती पर भारत का जो फ्यूड पास्ट है ना यह भारत में भी इसको तवज्जो क्यों दी जाती है समझना क्योंकि हमारा एक सामंतवादी इतिहास है जबरदस्त तरीके से और हमारे यहां पर वैचारिक क्रांति अभी पूरी तरह हुई नहीं है फ्यूड जम का क्या मतलब होता है फ्यूड जम के आपने सीलिट फीचर्स पढ़े होंगे अपनी सोशलॉजी वगैरह में क्या हो यह होता है कि जो फ्यूड लॉर्ड है वह करता कुछ नहीं है दूसरे काम करते हैं जो फूडल लॉर्ड है व बैठ के सबको वही बनना है और वह बनने के लिए अगर 10 साल खराब करने पड़े तो क्या हो गया यह बात हमारी मूल्य व्यवस्था में हो गई आ गई है कि सर्वोच्च आदमी वह है जो मेहनत नहीं करता बैठ के खाता है हम उससे रश्क करते हैं हमें ईर्ष्या होती है उससे जिसको हम पाए कि वह कुछ नहीं करता बैठ के खा रहा है हम यह नहीं कहते कि धिक्कार है इस आदमी पर करता कुछ नहीं बैठ के खा रहा है हमें लगता है वाह यार सही मजे है तेरे तो अभी भी लड़कियां होती है छोटी उनमें यह वैल्यू मूल्य डालने की कोशिश की जाती है कि अच्छे से अपने आप को बना संभाल के रख तुझे डॉक्टर इंजीनियर मिल जाएगा तेरी जिंदगी बन जाएगी तुम देख रहे हो उसमें क्या मूल्य डाला जा रहा है यही बैठ के खाएगी बैठ के खाएगी यही बात हमारी जाति प्रथा में भी दिखाई देती है इसलिए मैंने कहा कि दिस फिनोमिना इज यूनिक टू इंडिया जाति प्रथा का भी क्या मतलब है सबसे ऊपर पहुंच जाओ जहां करना कुछ नहीं है बैठ के खाना है और इज्जत भी खूब मिलेगी तुम वो हो जाओ जिसे कुछ नहीं करना है बस बैठ के खाना है इज्जत भी कूब पाओगे बस अथॉरिटी बन जाओ पावर सारा तुम्हारे पास आ गया अब करना थोड़ी कुछ है बैठ के खाओ यही बात यह भी एक्सप्लेन करेगी कि भारत की ब्यूरोक्रेसी दुनिया की सबसे भ्रष्ट ब्यूरोक्रेसीज में क्यों है क्योंकि उसमें आप वे इसीलिए करते हो कि करना कुछ नहीं है बैठ के खाना है तो जो जो हमारा फ्यूड पास्ट है हम उससे मुक्त नहीं हो पा रहे हैं रेनेसा जैसी चीज भारत में हुई नहीं है अभी तक हमारे लिए जीवन की सबसे ऊंची बात यही हो सकती है कि भाई करता कुछ नहीं है खाता है और भले ही डिजर्व नहीं करता पर उसके पास पावर और अथॉरिटी पूरी है राजा जी है य सबको राजा बनना है यहां पर किसी को भी श्रम नहीं करना है यहां सबको बस ऐश करनी है ऐश्वर्य चाहिए सबको हम क्या लोगों की मेहनत को पूजते हैं भारत में नहीं पूजते ना हम कहते हैं बस एक ऐसी जगह पा लो जहां पहुंच गए एक बार तो फिर कोई मेहनत नहीं करनी पड़ेगी चाहे वह जगह एक ट्रॉफी वाइफ की हो चाहे वह जगह एक पॉलिटिकल पावर की हो चाहे वह वजह अन अर्न्ड मनी की हो चाहे वह वजह ब्यूरोक्रेटिक अथॉरिटी की हो बस किसी ऐसी जगह पहुंच जाओ जहां एक बार पहुंच गए फिर बल्ले बल्ले उस जगह पहुंचने के लिए अगर जवानी के 10 साल खराब करने पड़े तो कर दो यह अनइंप्लॉयमेंट है सारा खेल मूल्यों का है वैल्यू सिस्टम का है किसी भी समाज में कुछ भी हो रहा हो तो बस यह देख लेना कि उस समाज में वैल्यू सिस्टम क्या है भारत के जो लोक मूल्य हैं जो हमारी कॉमन प्रवंजन में बहुत कुछ सड़ा हुआ है और हम उसको हटाने को तैयार नहीं है हम जिनको अपना आदर्श माने हम जिनको अपने गॉड्स माने वह श्रम शल क्यों नहीं है बताओ ना मेरा महापुरुष मेरा अवतार मेरा देवता तो वह होगा जो मेहनत कर रहा है संघर्ष और श्रम कर रहा है लेकिन हमारे जो प्रचलित सब आदर्श है चाहे वह सामाजिक हो या धार्मिक उनमें श्रम कहां दिखाई देता है कहीं दिखाई देता है जहां जहां दिखाई देता है वहां सौंदर्य है पर अधिकांशत श्रम नहीं दिखाई देगा अधिकांशत यह रहता है कि यह बस है भाई फलाने देव हैं वह स्वर्ग में क्यों राज कर रहे हैं क्योंकि वह देव है तो हर आदमी बस कभी मेहनत करके उनको दिखाया गया मैं नहीं कह रहा कि ऐसी चीज दूसरे देशों में या दूसरे समाजों में होती ही नहीं पर भारत में ज्यादा है मुझे क्या बन जाना है द फ्यूड लॉर्ड तो हमने अपने सब आदर्श भी उसी तरीके से बना दिए हैं द फूडल लॉर्ड्स और इसीलिए हीरो वरशिप का भी हमारे यहां बहुत चलन है कोई एक है जो वहां पहुंच गया और अब व वहां से सारा पावर कमांड कर रहा है कोई एक है जो डिग्निटी है स्ट्रगल में स्ट्राइफ में एफर्ट में लेबर में अटेंप्ट में हमें उसकी इज्जत करना सिखाया नहीं जाता हमसे यह नहीं कहा जाता कि जो हाथ चला रहा है सबसे ज्यादा इज्जत का वह अधिकारी है आप अगर वर्ण व्यवस्था में देखोगे तो जो हाथ चलाता है मेहनत करता है उसको हमने सबसे नीचे रख दिया है तो कोई क्यों हाथ चलाना चाहेगा तो फिर हम हाथ नहीं चलाना चाहते हम नहीं चलाना चाहते हाथ हम श्रम को इज्जत देते ही कहां है एक आदमी बहुत मेहनत करके कमाता है ईमानदारी से बताइएगा एक आदमी है बहुत मेहनत करके कमाता है और एक आदमी है जो बैठ के मुफ्त की रिश्वत की खाता है यह समाज इज्जत ज्यादा किसको देता है वो रिश्वतखोर कोही ज्यादा इज्जत मिलती है एक वर्किंग वुमन होती है 10 हाउसवाइफ मिल जाएंगी उसको ताने और मारगी कहेंगी बेचारी गरीब है इसलिए इसको मेहनत करनी पड़ती है देखो धूल में निकलती है धूप में निकलती है इसका तो मुंह काला हो गया हमें देखो हम खरगोश सी मुलायम खाल लेकर हम घर में रहते हैं शश करते हैं हमारा पति कोई भिखारी है क्या कि हमें काम करना पड़े डिग्निटी ऑफ लेबर नहीं है बल्कि जो लेबर कर रहा है उसको नीचे और दिखाओ और जो मुफ्त की खा रहा है बिल्कुल जमीन की भाषा में कहूं तो हराम की खा रहा है उसको इज्जत मिलती है आप शुरुआत करो मूल्य बदलो जिस किसी को देखो कि उसके पास अन अर्न्ड मनी है चाहे इन्हेरिटेंस से चाहे कोइंसिडेंस से उसको इज्जत मत दो ऋषि अष्टावक्र कुरु अनादर करना सीखो सिर्फ इसलिए तुम्हारे सामने कोई आ गया है और उसके पास एक अथॉरिटी है यह नहीं कि उसको नमस्ते कर दिया और सर झुकाने लग गए और यह सब है देखो कि इसमें योग्यता कितनी है देखो कि यह संघर्ष कितना करता है दिन रात संघर्ष को सम्मान देना सीखो बेरोजगार कम हो जाएगी संघर्ष को सम्मान देना सीखो बेरोजगारी कम हो जाएगी लोग कहेंगे क्या वह लोग संघर्ष नहीं कर रहे जो 10 साल तैयारी करते हैं नहीं साहब नहीं कर रहे हमने भी तैयारी करी और हम अच्छी तरह जानते हैं कि उस तैयारी में कितना संघर्ष लगता है और हमने भी एंपेन शिप करी और हम जानते हैं कि उसमें कितना संघर्ष लगता है जब भारत संघर्ष को सम्मान देने लगेगा आप पाओगे बेरोजगारी वगैरह गायब हो गई है कोई बेरोजगार हो कैसे सकता है क्या करने को कुछ नहीं है बिल्कुल है पर हम उसे छोटा काम बोलकर करते नहीं है और छोटा काम किस अर्थ में है कि इसमें पैसा नहीं है हमारे पास काम को बड़ा या छोटा कहने का और तो कोई पैमाना होता भी नहीं ना जिस काम में पैसा ना बहरा हमारी दृष्टि में छोटा हो जाता है और कोई भी अच्छा काम आपको पैसा देने ही लग जाएगा वह भी तुरंत इसकी कोई गारंटी तो होती नहीं तो हम फिर अच्छा काम करते भी नहीं नहीं तो बताओ ना आप एक आप एक जवान आदमी हो महिला हो पुरुष हो कुछ भी हो आप 21 के हो आप 25 के हो बेरोजगारी का मतलब क्या है आप बोल रहे हो मेरे पास करने को कुछ नहीं है क्यों करने को कुछ नहीं है निकलो देखो जहां कहीं भी कुछ गलत हो उसको ठीक करो और जो तुम करोगे उससे किसी ना किसी को तो फायदा होगा ही तो कुछ पैसा आने लग जाएगा तुम्हारा पेट चलने लग जाएगा उससे ज्यादा की कामना रखो मत क्योंकि श्रम संघर्ष और कार्य का स्तर मायने रखते हैं तुम्हें उसमें से मिल क्या रहा है व बाद की बात है भाई काम का क्या मतलब होता है काम का मतलब होता है मैंने कुछ करा और उसमें मेरा आनंद है मेरा संतोष है और जो मैंने करा उसके फल स्वरूप मुझे कुछ पैसे भी मिल गए पैसे मिल गए तो मेरा उससे घर चल गया यही तो काम है यही काम की परिभाषा है ना मैंने कुछ करा क्यों क्योंकि वो करना ठीक था और जो मैंने करा उससे दूसरे को भी फायदा हो गया तो मुझे कुछ मिल गया अगर तुम कोई अच्छा काम करोगे तो उससे किसी ना किसी को कुछ ना कुछ तो फायदा होगा ना तुम्हें कुछ पैसे मिल जाएंगे तुम करो ना बेरोजगारी शब्द का तो कोई अर्थ ही नहीं है घर में पड़े हुए हो और कह रहे हो मुझे कोई जॉब देने वाला नहीं है इसलिए घर में पड़ा हूं जॉब देने वाले का क्या मतलब है तुम्हारा मोहल्ला गंदा पड़ा हुआ है जाओ मोहल्ला पूरा साफ कर दो बोला मोहल्ला मैं साफ करूंगा बदले में हर घर से 50 लूंगा लो मिल गया रोजगार नहीं मिल गया दुनिया में इतना कुछ है जिसको ठीक किया जाना जरूरी है तुम उसको ठीक करो बदले में लोग तुम्हें पैसा दे देंगे काम भी अच्छा करोगे और तुम्हारा खर्चा भी चलेगा अजी साहब इतना आसान नहीं होता है यह जो लोग बोल रहे हैं इतना आसान नहीं होता बेटा आप जहां बैठे हो मैं वहां बैठ के उठ भी चुका हूं तो आप हमें मत बताइए कि आसान होता है कि कठिन होता है मैं जो काम कर रहा हूं यह कोई इंडस्ट्री नहीं होती है बस मुझे यह करना था मैंने किया और इससे जिनको लाभ हुआ वह मेरे साथ खड़े हो गए उन्होंने कहा आप और करिए आगे बढ़ी आप जो कर रहे हो उससे हमें ही ला हो रहा है हम आपको संसाधन देंगे आप आगे बढ़ी नहीं तो इसका कोई पहले से ब्लूप्रिंट थोड़ी उपलब्ध था कि ऐसे ऐसे करो ऐसे ऐसे करो तो कैरियर आगे बढ़ेगा और पैसा मिलेगा ना तो इसमें कोई कैरियर होता है ना कोई इंडस्ट्री है ना यह काम ऐसा है कि कोई और कर रहा है तुम नकल करके कर डालो जो मुझे ठीक लगता गया मैं करता गया और चूंकि जो मैं कर रहा था वो औरों के भी काम आ रहा था तो उनसे मुझे फिर समर्थन मिलता गया आप भी देखिए ना कि क्या ठीक है जमाने में करने के लिए और उसको करिए और यह भरोसा रखिए कि भूखे नहीं मरेंगे हां अयाशी की चाहा हो बैठे-बैठे खाना हो तो फिर कोई उपाय नहीं है सही संघर्ष करने निकलो कोई बेरोजगारी नहीं रहेगी मोटी माया सब तजे जीनी तजी ना जाए मोटी माया सब तजे जीनी तजी ना जा पीर पैगंबर औलिया झीनी सबको खाए रे साधु झीनी सब को खा मोटी माया सब तजे जीनी तजी ना जाए मोटी माया सब तजे नी जीी ना जाए पीर पैगंबर औलिया नी सबको खाए रे साधु जीनी सबको खा माया तो ठगनी भई ठग फिरे सबते माया तो ठगनी भई ठग फिरे सब देश जा ठगने ठगनी ठगी ठग को आदेश रे साधो ठक को आदेश माया तो ठगनी भई ठग फिरे सब देश माया तो ठगनी भई ठग फिरे सब देश जा ठगने ठगनी ठगी ठग को आदेश रे साधु ठक को आदेश भीतर तो बेदा नहीं बाहर कथ है अनेक भीतर तो भे नहीं बाहर कथ है जो प भीतर लखी परे भीतर बाहर एक रे साधु भीतर बाहर मैं गौरव सिंह हूं और मैं एक पब्लिक सेक्टर बैंक में अभी शाखा प्रबंधक के पद पर नाथ हूं और मैं मेरा होम टाउन बनारस है और अभी मेरी पोस्टिंग कानपुर में है तो कानपुर देहात में मैं कानपुर देहात में रहता हूं आचार्य जी को नवंबर 20222 करीब डेढ़ साल पहले सुनना शुरू किया था और क्योंकि मैं एक क्षत्री फैमिली से आता हूं तो वहां पर बचपन से ही मान सहार के बारे में बोला जाता है कि म बच्चों को सिखाया जाता है वहां ये सब बहुत ज्यादा वो रहता है तो मैं भी क्योंकि उसी बैकग्राउंड से आया था तो मांसाहार करता था ज्ञान से पूरी तरीके से भरा हुआ था कुछ पता नहीं था हालांकि कष्ट तो बहुत रहता था बट सलूशन नहीं मिलता था कि क्यों कारण क्या है अपने प्रश्नों के उत्तर कभी मिलते नहीं थे बस एक दुविधा में रहता था आचार्य जी को सुनना शुरू किया नवंबर 2022 में 101 दिन सुनने के बाद फिर रोहित सर से बात हुई मेरे काउंसलर है एनरोल किया लाइव सेशन में नवंबर 2022 सेही गीता से में अभी चारों सेशन में जुड़ा हुआ हूं लगातार सुनता हूं आचार्य जी को बदलाव यह आया कि तीन महीने के अंदर ही मतलब फरवरी 20 में मैं ऋषिकेश में ऑफलाइन सत्र मैंने अटेंड किया आचार्य जी का और सत्र से बाहर निकलने के बाद करीब एक साल हो गया आजीवन की लिए मेरा तुरंत मान सहार हमेशा हमेशा के लिए छूट गया कुछ दिन और सुना आचार्य जी को तो डेरी प्रोडक्ट भी छोड़ दिए दुखदा हार भी पूरी तरीके से गगन हो चुका हूं करीब छ महीने से और लोगों को भी मोटिवेट करता हूं एक और बदलाव बहुत बड़ा जो आया है कि अब मैं जितने भी मेरे फ्रेंड्स है रिलेटिव्स है रिश्तेदार है तो मेरे पहले जो भी बातें होती थी विभिन्न प्रकार के मुद्दे होते थे बट अब मेरी जो बात होती है हालाकि कुछ लोग पसंद करते हैं लोग मुझे मुझसे शेयर भी करते हैं बट अब जो मेरी बात होती है व सबसे यही बात होती है कोई मेरा फोन उठाएगा क्यों परेशान हो तो जो मैं आचार्य जी से सीखता हूं अपने हालाकि अज्ञानी तो बहुत ज्यादा हूं कोशिश करता हूं कि इही सब मुद्दों पर बात करूं भगवत गीता प या मैंने जो सीखा है अपने लेवल पर जो भी कोशिश करूं कि बता सक लोगों को बताता हूं तो मेरा विषय हमेशा यही रहता है आचार्य जी की सीख और वनिज म और को प्रमोट करना और जो भी हम सत्रों में सी बातें बताई जाती हैं उसको मैं लोगों से उन्हीं टॉपिक्स पर ही बात करता हूं [संगीत]

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